
चोपन, सोनभद्र।देश जहां आज बुलेट ट्रेन के संचालन और परिचालन के बहुत करीब है, वही हम उर्जांचल वासी विश्व की न्यूनतम गति से चलने वाली सुपर स्लो एक्सप्रेस त्रिवेणी एक्सप्रेस से चोपन से लखनऊ का मात्र 8 घंटे का सफर 16 घंटे में पूरा करने के रोमांचक अनुभव का आनंद प्राप्त करने के लिए बाध्य हैं । त्रिवेणी संगम में संयुक्त होने वाली नदियों की गति से भी धीमी गति से चलने वाली यह लौह पथ गामिनी अपनी गति और दुर्गति के लिए किसी भागीरथ के लिए प्रतीक्षारत है,जो इसे उचित गति प्रदान करवा सके । जहां अन्य गाड़ियां चोपन से प्रयागराज तक का सफर 4 से 5 घंटे में पूरा करती हैं। वहीं इसे 8 घंटे की कड़ी मेहनत मस्कत करनी पड़ती है। जो इसके धैर्य की अग्नि परीक्षा है। ऐसा नहीं कि इसके चरणों में ग्रीस कम है। वरन किसी प्रेत बाधा ने इसके पांव बांध दिए हैं। यह दौड़ना तो चाहती है पर इसके पैरों में राजनीतिक बेड़िया पड़ी हुई है और यह दलों के दलदल में फंसी हुई है। कुछ लोगों को समय से सुलाने के लिए बहुतों को रात भर जगाती है। चुनार से प्रयागराज के मध्य यह प्रायः स्वयं ही गहरी चिर निद्रा में सो जाती है फिर इसे उठो लाल अब आंखें खोलो की धुन सुना कर जगाना पड़ता है और फिर यह अलसाई आंखों से आगे बढ़ती है और किसी तरह राजधानी क्षेत्र में प्रवेश करती है, वहां से इसमें सक्रिय राजनैतिक चेतना का प्रवेश होता है और यह कई द्रुतगामी गाड़ियों को पीछे छोड़ते हुए आगे निकल जाती है जिसका आनंद हम अधिकांश ऊर्जाचल वासी नहीं ले पाते क्योंकि हमारी मंजिल अधिकांशत प्रयागराज या लखनऊ तक की होती है ।
काश इसका सफर शुरुआत से अंत तक एक जैसा होता और यह ट्रेन राजनीति के बजाय किसी नीति से चलती तो हमारी नियति बदल जाती
बहरहाल..
जल है तो जीवन है!
ट्रेन है तो सफर है ,
चाहे तेज चाहे धीमा..
बी एस नादान
Ex असिस्टेंट डायरेक्टर ऑडिट










