पुराणों के अनुसार छठी मईया प्रकृति के देवी हैं ।
सृष्टि के रचना के समय प्रकृति ने अपने आप को छः भागो में बंटा था यह छठा भाग ही छठी मैया कहलाती हैं। जिनकी पूजा कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष षष्ठी तिथि को मनाया जाता हैं। सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी की मानस पुत्री माना जाता हैं।
सनातन धर्म के पौराणिक कथाओं में यह बताया गया हैं कि कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष षष्ठी को व्रत रहने से मनोकामना पूर्ण होती है।
त्रेता युग मे चौदह वर्ष बनवास झेलने के बाद भगवान रामचंद्र जब अयोध्या लौटे तो सुख शांति स्मृद्धि के लिए माता सीता ने अपने मायके में कार्तिक मास शुक्ल पक्ष के षष्ठी को व्रत रखा था तब से बिहार में यह पर्व मनाया जाता है।
वही द्वापर युग मे जब पांडवो को देश निकाला कर दिया गया था तो द्रोपदी ने अपना राज पाठ वापस लाने के लिए कार्तिक मास शुक्ल पक्ष के षष्ठी को व्रत रखा था।
षष्ठी भगवान ब्रह्मा जी की मानस पुत्री थी और कार्तिकेय की पत्नी और भगवान सूर्य की बहन ।इसी लिए छठी मैया कहते हैं।
आज भी घर मे जब बच्चा पैदा होता है तो छठी को स्नान होता है जिसको छठी बरही छठीहार कहते हैं।
एक मान्यता के अनुसार सूर्य पुत्र कर्ण पर सूत -पूत का लाछन लगा था इस लाछन से मुक्ति प्राप्त करने के लिए कर्ण ने कार्तिक मास शुक्ल पक्ष को छह दिवसीय कठोर तप किए थे तब से सूर्य की उपासना होने लगी।
वही शास्त्रों के अनुसार बरसात (वर्षा ऋतु) के बाद कार्तिक मास शुक्ल पक्ष को पृथ्वी पर बच्चे हुए कन्द फल फूल भगवान सूर्य को अर्पित किया जाता है कि हे प्रभु बरसात के बाद भी यह सब आपकी कृपा से बच गया है इसे आपको अर्पित करते ।।
बांस को वन्स का प्रतीक माना गया हैं , इसलिए बांस से बने सुप से अर्घ्य दिया जाता हैं।
पानी में पुत्र रत्न प्राप्ति के लिए खड़ा होकर तप किया जाता हैं

पूजा बिधि
कार्तिक मास शुक्ल पक्ष के चतुर्थी को कद्दू ,चना दाल एव भात खा कर शरीर को शुद्ध किया जाता हैं।
पंचमी तिथि को पूरे दिन उपवास रहने के बाद नए गुड़, नए चावल को आम के लकड़ी पर पकाकर प्रसाद खाया जाता है।
षष्ठी को निर्जला शाम को डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता हैं एव सप्तमी को सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता हैं। अर्घ्य देने वाले को सिलाई किया हुआ कपड़ा नही पहनना चाहि










